क़ैद में इल्म के चराग़ और उसके नताईज

आज हिंदुस्तान के हालात में यह सवाल बहुत अहम हो गया है कि जब किसी क़ौम  के आलिम, तालीब-ए-इल्म और मुफ़क्किर  सलाख़ों के पीछे डाल दिए जाएँ तो उस क़ौम की तरक़्क़ी किस तरह मुमकिन होगी।

 इल्म और रहनुमाई की कमी


इल्म हमेशा से इंसानी समाज का सबसे बड़ा ज़रिया-ए-रहनुमाई रहा है। जब समाज के अक़्लमंद  और रहबर जेलों में बंद कर दिए जाएँ, तो नई नस्ल अपने रास्ते से भटक जाती है। उनके पास न उसूल समझाने वाला होता है, न ही हिम्मत दिलाने वाला।

 ख़ौफ़ और ख़ामोशी

जब क़ौम देखती है कि उसके आलिम और नुमायंदे सिर्फ़ अपने विचार  या एहतिजाज की वजह से क़ैद कर लिए गए, तो बाक़ी लोग ख़ौफ़ की वजह से ख़ामोश हो जाते हैं। इस ख़ामोशी का नतीजा यह निकलता है कि समाज में सवाल उठाने की जुर्रत कम हो जाती है और ज़ुल्म बढ़ने लगता है।

 तालीम और तरक़्क़ी पर असर

हर क़ौम की तरक़्क़ी की बुनियाद तालीम और तफ़क्कुर पर होती है। अगर यही तालीम देने वाले लोग जेल में डाल दिए जाएँ, तो समाज के बच्चे और नौजवान न सिर्फ़ मायूस होते हैं, बल्कि उनका भविष्य भी अंधेरे में धकेला जाता है।

 तवारीख़ (इतिहास) की गवाही


तारीख़ गवाह है कि जब भी किसी क़ौम के आलिम और मुफ़क्किर क़ैद किए गए, उस क़ौम की तरक़्क़ी रुक गई। चाहे वह दौर-ए-इस्ते‘मार यानी colonial period हो, Apartheid South Africa हो, या फिर भारत में दलित तहरीक—जहाँ भी इल्म के चराग़ बुझाए गए, वहाँ ज़ुल्म ने अपनी पकड़ मज़बूत की। मगर साथ ही, यह भी हक़ीक़त है कि इन मुश्किल हालात से अक्सर नई तहरीकें यानी movements पैदा हुईं और नई रहनुमाई सामने आई।

 नतीजा

अगर किसी क़ौम के आलिम, तालीब-ए-इल्म और मुफ़क्किर सलाख़ों के पीछे डाल दिए जाएँ, तो वह क़ौम तात्कालिक तौर पर कमज़ोर पड़ सकती है। लेकिन अगर वही क़ौम सब्र, हिम्मत और इत्तेहाद से काम ले, तो यह अंधेरा भी रोशन हो सकता है।

~ इंजीनियर औरंगज़ेब आज़म