एक रानी और दासी के बीच में बहुत गहरी दोस्ती थी, दासी हमेशा रानी के साथ रहती थी,  और रानी हमेशा दासी के साथ बहुत ही अच्छे तरीके से पेश आती थी।

इस वजह से इस दासी की सारे ही महल में बड़ी इज़्ज़त थी, सभी लोग दासी के साथ बहुत ही आदर और सम्मान पूर्वक पेश आते थे।

एक बार जब रानी के बालों को सुलझा रही थी, तब उसने अचानक से रानी से कहा।

"बेगम साहिबा" वो वक़्त कब आएगा, जब आपका मुंह और मेरे हाथ काले होंगे?

दासी की यह बात सुनते ही रानी बहुत बुरी तरह से भड़क गई, और उसने सैनिकों को हुक्म दिया, कि इस गुस्ताख़ दासी को 10 घोड़े मारे जाएं, और इसको हमेशा-हमेशा के लिए महल से बाहर निकाल दिया जाए।

जैसा रानी ने हुक्म दिया था, सैनिकों ने बिल्कुल वैसा ही किया।

जिस इंसान ने दासी को कोड़े मारे थे, उसने उस दासी से कहा कि रानी तुम्हारे साथ इतनी इज़्ज़त से पेश आती थी, फिर तुमने यह गुस्ताख़ी क्यों की?

इस पर उस दासी ने जवाब दिया, कि मेरी अकल घांस चरने चली गई थी, और बेतहाशा इज़्ज़त मिलने की वजह से, मैं यह भूल गई थी, कि मैं किससे मज़ाक कर रही हुं।

दरअसल में रानी साहिबा से मज़ाकिया अंदाज़ में ये पूछ रही थी, कि वो मौसम कब आएगा, जब मैं आपको होला अपने हाथों से खिलाऊंगी, जिससे मेरे हाथ और आपका मुंह काला हो जाएगा?

निष्कर्ष;

जिस जगह हमें इज़्ज़त मिल रही है, वहां पर हरगिज़ मज़ाक नहीं करना चाहिए, और हमेशा  बराबर वालों के साथ मज़ाक करना चाहिए, बड़े लोगों के साथ बात करते हुए सतर्कता बरतनी चाहिए।

क्योंकि ज़बान जब भी चलती है, तब हमेशा दो चीज़ों में से एक चीज़ ज़रूर दिलवाती है, इज्जत या फिर ज़िल्लत।

लेखन; इमरान उज़ ज़माँ
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मज़ाक से बचें
लोगों के साथ इज़्ज़त से पेश आएं
जहां काम कर रहे हैं, वहां मज़ाक नहीं करें