जैसा कि आप सभी पाठक जोकि न्यूज़ मोहल्ला की वेबसाइट पर आर्टिकल पढ़ते हैं, वो इस बात को बहुत अच्छी तरह जानते हैं, कि न्यूज़ मोहल्ला हमेशा आप सभी के लिए वह खबरें लेकर आता है, जो की आपके लिए और सारे समाज के लिए उपयोगी होती हैं।
इसी कड़ी में आज हम आपके लिए एक विषय लेकर आए हैं, जो विषय हम लोगों से जुड़ा हुआ है, हमारे घर में किसी एक सदस्य से या अनेक सदस्यों से जुड़ा हुआ है, उनके स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है, जिसमें बीमार होने पर हम डॉक्टर के द्वारा लिखी हुई दवाएं खाते हैं, तो आज हम उन दवाओं के संबंध में ही आपको जानकारी उपलब्ध करवाएंगे।
बाज़ार में दो तरह की दवाएं उपलब्ध हैं, पहली एथिकल दवा जिसको डॉक्टर मरीज़ो को लिख रहे हैं, और दूसरी जेनेरिक दवा, इन दोनों के बीच के अंतर को हम इस लेख के माध्यम से समझेंगे, ताकि जेनेरिक दावों के संबंध में जो हमारे बीच में भ्रांतियां हमारे बीच में पाई जाती हैं, उनको तथ्यों के आधार पर समझा और फिर दूर किया जा सके।
सबसे पहले हम यह समझते हैं, कि एथिकल दवाओं और जेनेरिक दवाओं में क्या फ़र्क होता है;
एथिकल (ब्रांडेड) दवाएं वो दवाइयाँ होती हैं, जिन्हें किसी बड़ी फ़ार्मा कंपनी द्वारा शोध, विकास और मार्केटिंग के बाद एक विशेष ब्रांड नाम से बेचा जाता है, इनकी कीमत में रिसर्च, विज्ञापन और मार्केटिंग का खर्च शामिल होता है।
जेनेरिक मेडिसिन वे दवाइयाँ हैं, जिनका फॉर्मूला बिल्कुल एथिकल दवाओं जैसा ही होता है, पर इन्हें बिना ब्रांडिंग के बहुत कम क़ीमत में बेचा जाता है, क्योंकि इनकी कीमत में विज्ञापन और अतिरिक्त ब्रांड लागत नहीं जुड़ी होती है।
जेनेरिक मेडिसिन की उपयोगिता और यह एथिकल मेडिसिन से सस्ती क्यों होती हैं?
जेनेरिक दवाइयाँ एथिकल दवाइयों के जितनी ही असरदार होती हैं, क्योंकि इनमें वही सक्रिय रसायन (API – Active Pharmaceutical Ingredient) मौजूद होता है, बल्कि एक ही कंपनी एथिकल दवाएं और जेनेरिक दवाएं दोनों ही बनाती हैं, ऐसी कई बड़ी कंपनियां मार्केट में मौजूद हैं, दवाओं की सिप्ला कंपनी इस बात का एक प्रमाण और उदाहरण है।
अब आईए हम देखते हैं, कि सारी दुनिया में जेनेरिक दवाओं का कितना इस्तेमाल होता है;
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार दुनिया भर में लगभग 60%-65% दवाइयाँ जेनेरिक दवाइयों के रूप में इस्तेमाल की जाती हैं, अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों में भी बीमा योजनाएँ जेनेरिक दवाओं को प्राथमिकता देती हैं।
सबसे ज्यादा जेनेरिक मेडिसिन किस देश में इस्तेमाल होती हैं?
अमेरिका विश्व में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, अमेरिका में लगभग 90% प्रिस्क्रिप्शन दवाएँ जेनेरिक स्वरूप में दी जाती हैं, इसके अलावा यूरोप, जापान और विकासशील देशों में भी इनका उपयोग लगातार बढ़ रहा है।
अब लिए हम देखते हैं, कि भारत देश की जेनेरिक दवाओं के संबंध में क्या स्थिति है, और भारत में जेनेरिक दवाओं को लेकर क्या नियम है?
भारत सरकार ने 2017 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) के माध्यम से नियम बनाया है, कि डॉक्टरों को मरीज़ो को दवाएँ लिखते समय जेनेरिक दवाएँ (Generic Medicines) लिखना चाहिए।
इसके साथ ही, भारत सरकार ने “जन औषधि योजना (PMBJP – Pradhan Mantri Bhartiya Janaushadhi Pariyojana)” शुरू की है, जिसके तहत पूरे देश में सस्ते दामों पर जेनेरिक दवाइयों के स्टोर्स खोलकर उनमें जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
एक बड़ा सवाल हमारे दिमाग में यह आता है, कि जब अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे विकसित और बड़े देश जेनेरिक दावों का इस्तेमाल कर रहे हैं, तब भारत में डॉक्टर जेनेरिक मेडिसिन क्यों नहीं लिखते, जबकि एक शोध के अनुसार एक बीमार व्यक्ति के इलाज में 68% खर्चा दवाओं के रूप में होता है, वहीं अमेरिका में यही खर्च सिर्फ 19% होता है।
तो आइए जानते हैं, इसकी वजह क्या है, जो भारत में जेनेरिक दावों का इस्तेमाल काम होता है:
कई डॉक्टर ब्रांडेड कंपनियों से जुड़े होते हैं और उन्हें प्रोत्साहन (गिफ्ट्स/कमीशन) मिलता है।
मरीजों को विश्वास दिलाना मुश्किल होता है क्योंकि आम धारणा है कि “सस्ती दवा, कम असरदार।”
डॉक्टरों को कभी-कभी संदेह होता है, कि बाज़ार में उपलब्ध सभी जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता (क्वॉलिटी) एथिकल दावों के बराबर नहीं है।
भारत में कितने प्रतिशत जेनेरिक मेडिसिन का इस्तेमाल होता है?
भारत जोकि विकासशील देश है, इस में कुल दवा बाज़ार का लगभग 10%-12% हिस्सा ही शुद्ध जेनेरिक दवाओं का है, जबकि विकसित देशों की तुलना में यह प्रतिशत काफी कम है।
जैसा कि हमने ऊपर बताया, कि जेनेरिक मेडिसिन स्टोर शुरू करने के संबंध में भारत सरकार की एक योजना है, जोकि इस प्रकार है;
भारत सरकार ने प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि योजना (PMBJP) के तहत पूरे देश में “जन औषधि केंद्र” खोलने की योजना बनाई है, इन केंद्रों पर सामान्य दवाएँ (Generic Medicines) बहुत कम कीमत पर उपलब्ध कराई जाती हैं, कोई भी पात्र व्यक्ति सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों को पूरा करके जन औषधि केंद्र खोल सकता है।
अंत में सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा, जो सवाल हम में से मौजूद अक्सर लोगों के दिमाग में आता है, कि क्या जेनेरिक मेडिसिन की क्वालिटी खराब होती है या यह असरदार होती हैं?
तो यह कहना सरासर ग़लत है, कि जेनेरिक दवाओं की क्वालिटी खराब होती है, या यह कम असरदार होती हैं, क्योंकि जेनेरिक दवाएँ भी उन्हीं मानकों के अनुसार बनाई जाती हैं, जो एथिकल दवाओं के लिए तय किए गए हैं, भारत में सभी जेनेरिक दवाओं को ‘सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (CDSCO)’ की मंजूरी लेनी होती है, सही निर्माण कंपनियों की जेनेरिक दवाएँ, एथिकल दवाओं जितनी ही असरदार और सुरक्षित होती हैं।
निष्कर्ष:
जेनेरिक मेडिसिन लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा को सुलभ और सस्ती बनाने का सबसे महत्वपूर्ण साधन है, भारत में इनके उपयोग को लेकर अभी भी चुनौतियाँ हैं, लेकिन सरकार की योजनाएँ और जागरूकता कार्यक्रम धीरे-धीरे इसकी स्थिति को बेहतर बना रहे हैं।
अगर भारत सरकार द्वारा इस पर एक मुहिम चलाई जाए, और लोगों को ऑफलाइन और ऑनलाइन माध्यम के द्वारा जागरूक किया जाए, जिस तरह "सत्यमेव जयते प्रोग्राम" में आमिर खान ने इस पूरे एपिसोड को कवर किया था, और सेवा कार्यों में लिप्त व्यक्तियों और स्वयं सेवी संस्थाओ द्वारा और इस संबंध में जागरूकता के लिए नुक्कड़ नाटक किए जाएं, तो जेनेरिक दवाओं के संबंध में लोगो को जागरूक करना आसान हो जाएगा।
तब इस मुहिम के द्वारा भारतवासियों को महंगी दवाओं से छुटकारा मिल जाएगा, और हमको जो एक बड़ा खर्च दवाओं पर करना पड़ रहा है, उससे निजात मिल जाएगी, इससे महंगी दवाओं से बचे हुए पैसे का इस्तेमाल, हम अपनी दूसरी ज़रूरतो को पूरा करने के लिए कर सकते हैं, शिक्षा हासिल करने के लिए कर सकते हैं।
लेखक; इमरान उज़ ज़माँ
मेल आईडी; imranuzzaman01@gmail.com