लापता बचपन...

मेरे मोहल्ले की कहानी

वो जो निकल आती थी, घरों से, 

इठलाते-मस्ताते नटखटों की टोली, 

अब वो घरों से बाहर ही नहीं आती, 

अब जकड़ रखा है, इन नन्हें मासूमों को, 

एक "जादूगर" ने कब्ज़े में अपने, 

कर रखा है, उसने सबको अपने वश में, 

गली, खेल मैदान, अब तो खाली ही रहते हैं, 

यहां आकर वह जो चहचहाते थे, नन्हे पंछी, 

वो अब हर वक़्त चार दिवारीयों में क़ैद ही रहते हैं, 

मां बाप बाहर निकलो अपने घर से इस "जादूगर" को,

जिसने खुटे से बांध लिया है, हस्ते खेलते बचपन को,

वो जो निकल आती थी कभी घरों से,

इठलाते-मस्ताते नटखटों की टोली, 

अब वो घरों से बाहर ही नहीं आती,


लेखक इमरान उज़ ज़माँ 
ई-मेल imranuzzaman01@gmail.com