"एक सवाल"
हे मानव...
तू जब तक सबसे घुला मिला रहता था, तो रहता था, मस्त मौला।
लेकिन जब से तू मशीनों की ज़ंजीरों में जकड़ा, तो उदास होकर रह गया।
क्यों बदहवास भागा ही जा रहा है, जोखिम में डालकर जीवन अपना।
तनिक भर के लिए तो रोक ले, ये तेज़ रफ़्तार दिशाहीन सफर अपना।
अपने दिल और दिमाग़ को कुछ वक़्त के लिए ज़रा सुकून भी तो ले लेने दे।
मंज़िल तक तू ज़रूर पहुंच, लेकिन खुद को सफ़र के मज़े तो ले लेने दे।
क्या सारी दुनिया जीत ने की चाह में तू बर्बाद होना चाहता है?
क्या जान की बाज़ी, दांव पर लगाकर तू कामयाब होना चाहता है?