भारत के हर शहर, हर मोहल्ले में एक जैसी तस्वीर दिखाई देती है -

कहीं सड़क किनारे सब्ज़ी बेचने वाला ठेले वाला पुलिस से भागता नज़र आता है,
कहीं रेहड़ी वाला अपना सामान जल्दी-जल्दी समेट रहा होता है क्योंकि नगर निगम की गाड़ी आ गई,
और इसी बीच, उसी सड़क के थोड़े आगे एक बड़ा शोरूम या मॉल फुटपाथ पर रैंप बनाकर, बोर्ड लगाकर आराम से चल रहा होता है -
उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती।

सवाल सीधा है -
क्या कानून सिर्फ गरीबों के लिए बना है?
क्या बड़े मॉल और रसूखदार दुकानदार कानून से ऊपर हैं?


 कानून क्या कहता है?


भारत सरकार ने साल 2014 में एक महत्वपूर्ण कानून बनाया था -
"स्ट्रीट वेंडर्स (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act, 2014"
यानी “सड़क पर व्यापार करने वालों के जीवन-यापन और उनके नियमन के लिए कानून”।

इस कानून के मुताबिक:

1. हर शहर में वेंडिंग ज़ोन तय किए जाने चाहिए।


2. हर वेंडर (ठेले, रेहड़ी, फेरीवाले) को सर्वे के बाद “Certificate of Vending” (CoV) दिया जाना चाहिए।


3. बिना सर्वे, बिना नोटिस, किसी का ठेला या सामान जब्त नहीं किया जा सकता।


4. यदि किसी क्षेत्र को “नॉन-वेंडिंग” घोषित करना है, तो उसका भी लिखित नोटिफिकेशन जरूरी है।



लेकिन वास्तविकता यह है कि बहुत से शहरों में

न सर्वे पूरा हुआ,

न वेंडिंग ज़ोन बने,

और फिर भी रोज़ ठेले वाले हटाए जाते हैं।


यानि कानून है, पर उसका पालन नहीं हो रहा।


 जमीन पर हकीकत क्या है?


1. ठेले वालों पर कार्रवाई हर हफ्ते होती है:
नगर निगम की टीमें आकर ठेले उठा लेती हैं, जुर्माना लगाती हैं, या सड़क खाली करा देती हैं।
ये कार्रवाई अक्सर “ट्रैफिक बाधा” या “अतिक्रमण” के नाम पर की जाती है।


2. गाड़ियों पर ट्रैफिक पुलिस की मार:
कोई आम आदमी दो मिनट के लिए दुकान से दवाई लेने रुक जाए, उसकी गाड़ी उठ जाती है, चालान कट जाता है।
लेकिन वहीँ पास में बड़े रेस्टोरेंट या शो-रूम फुटपाथ घेरकर पार्किंग बना लेते हैं - उन पर कोई कार्रवाई नहीं।


3. बड़े मॉल और शोरूम का अतिक्रमण:
कई बड़े प्रतिष्ठान अपने सामने रैंप बनाते हैं, विज्ञापन बोर्ड लगाते हैं, या फुटपाथ पर सजावट कर देते हैं।
यह भी अतिक्रमण है - लेकिन प्रशासन अक्सर चुप रहता है।


4. समानता का अभाव:
वही गलती, लेकिन कार्रवाई सिर्फ कमजोर पर।
रसूख, पैसा और पहुँच रखने वालों पर कानून हल्का पड़ जाता है।


अदालतें क्या कहती हैं?

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट कई बार कह चुके हैं कि:

बिना सर्वे और बिना नोटिस किसी वेंडर को हटाना ग़ैरकानूनी है।

वेंडर्स को आजीविका का संवैधानिक अधिकार है।

नगर निगम को पारदर्शी और न्यायपूर्ण प्रक्रिया अपनानी चाहिए।


हाल में महाराष्ट्र के पिंपरी-चिंचवाड़ में लगभग 19,000 वेंडर्स को सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम सुरक्षा दी -
जब तक सर्वे पूरा न हो जाए, उन्हें हटाया नहीं जा सकता।


इस दोहरे रवैये के नुकसान

1. गरीब पर सीधा असर:
ठेले वाले की रोज़ की कमाई ही उसका पेट पालती है। ठेला उठ गया तो परिवार भूखा।


2. भरोसा टूटना:
कानून है, पर पालन नहीं। जनता का भरोसा प्रशासन पर से उठने लगता है।


3. शहर की असमानता:
जो ताकतवर है, वह सड़क पर कब्ज़ा भी कर ले तो चलता है;
जो मज़दूर है, उसका सामान भी जब्त हो जाता है।


ऐसा क्यों होता है?

1. रसूख और दबाव:
बड़े व्यापारी, मॉल मालिक, नेताओं या अधिकारियों से संपर्क रखते हैं।
इस वजह से उन पर कार्रवाई करने में डर या हिचक दिखती है।


2. राजस्व की राजनीति:
बड़े व्यापारी टैक्स देते हैं, विज्ञापन लगाते हैं - प्रशासन उनसे टकराना नहीं चाहता।


3. कमज़ोर की आवाज़ कम:
ठेले वाला अदालत नहीं जाता, मीडिया तक नहीं पहुँचता, इसलिए उसकी बात कोई नहीं सुनता।


4. नियम अधूरे:
कई शहरों में वेंडिंग ज़ोन अब तक तय नहीं हुए, इसीलिए कार्रवाई मनमानी होती है।


 समाधान क्या है?

1. सबके लिए समान नियम:
अतिक्रमण गलत है - चाहे वह 5 फुट का ठेला हो या 5000 स्क्वायर फीट का शोरूम।
कार्रवाई बराबर होनी चाहिए।


2. सर्वे और वेंडिंग ज़ोन:
हर शहर में सही सर्वे हो और वेंडिंग ज़ोन तय किए जाएँ।
जहाँ ठेले लगने की जगह निर्धारित हो, वहाँ कोई परेशानी न हो।


3. नोटिस और विकल्प:
यदि किसी को हटाना जरूरी हो तो पहले नोटिस दें और वैकल्पिक जगह दें।


4. पारदर्शिता:
किस पर कार्रवाई हुई, किस पर नहीं - यह जानकारी सार्वजनिक हो।


5. जनभागीदारी:
स्थानीय नागरिक और मीडिया निगरानी रखें कि नियम सब पर बराबर लागू हों।


जनता की आवाज़

 “हम भी इस देश के नागरिक हैं।
पेट पालने के लिए ठेला लगाते हैं, चोरी नहीं करते।
कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए - सिर्फ गरीब पर नहीं।”


लब्बोलुआब:

अतिक्रमण हटाना ज़रूरी है - लेकिन न्यायसंगत और समानता आधारित तरीके से।
यदि सरकार और प्रशासन वाकई “स्वच्छ शहर” और “सुंदर सड़क” बनाना चाहते हैं,
तो पहले यह तय करें कि

कानून सब पर लागू होगा,

रसूख किसी को नहीं बचाएगा,

और रोज़ी-रोटी का सम्मान बना रहेगा।


तभी जनता का भरोसा लौटेगा, और व्यवस्था पर विश्वास बनेगा।