आज बात एक ऐसे मुद्दे पर जो कि हमारी ज़िंदगी से जुड़ा हुआ है ज़रूरत से जुड़ा हुआ है, और यह वह मुद्दा है, जिसको हमारे समाज द्वारा गंभीरता से नहीं लिया जाता है, लेकिन यह हमारे लिए हमारे समाज के लिए बेहद गंभीर है।

जी हां हम आज जिस मुद्दे पर बात करेंगे वह मुद्दा "पानी" का है। 

आंकड़ों के अनुसार पृथ्वी की सतह का लगभग "इकहत्तर प्रतिशत" हिस्सा पानी से ढका हुआ है, NASA स्पेस प्लेस के अनुसार इस पानी का लगभग "छियानवे प्रतिशत" हिस्सा महासागरों और समुद्रों में है, जो खारा है, केवल "तीन प्रतिशत" पानी ही मीठा है, जिसमें से अधिकांश ग्लेशियरों और बर्फ की चादरों में जमा हुआ है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए चरमपंथी हमले के बाद, भारत ने पाकिस्तान के साथ "सिंधु जल संधि को रोक दिया" है, यानी अब इस संधि के मुताबिक भारत, पाकिस्तान के साथ कोई जानकारी साझा नहीं करेगा, और न ही इससे जुड़ी किसी बैठक में हिस्सा लेगा।

प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध (फर्स्ट और सेकंड वर्ल्ड वॉर) हुए, जिसका एकमात्र मकसद सत्ता को कब्ज़े में करता था, युद्ध हमेशा एक देश के लिए फायदेमंद और दूसरे देश के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत के लिए यह नुकसानदेह ही साबित होते हैं।

ख़ैर हम अपने मुद्दे पर लौटते हैं, क्या लगभग 30 साल पहले एक व्यक्ति ने तीसरा विश्व युद्ध (थर्ड वर्ल्ड वॉर) के संबंध में एक भविष्यवाणी की थी, जिसके तहत उसने बताया था, कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए हो सकता है?

जी हाँ दरअसल, वाकई किसी ने ये भविष्यवाणी की थी, कि अगर तीसरा विश्वयुद्ध हुआ, तो वो पानी को लेकर लड़ा जाएगा।

पानी के स्रोतों और भंडार पर कब्ज़े को लेकर तीसरे विश्वयुद्ध की भविष्यवाणी करने वाले शख्स का नाम था, बुतरस घाली जो कि संयुक्त राष्ट्र के महासचिव थे। 

बुतरस घाली ने 30 साल पहले पानी की कमी से होने वाली भयावहता को समझते हुए ये भविष्यवाणी की थी।

वहीं साल 1995 में वर्ल्ड बैंक के इस्माइल सेराग्लेडिन ने पानी के वैश्विक संकट पर कहा था, कि इस शताब्दी में तेल के लिए युद्ध हुआ, लेकिन अगली शताब्दी की लड़ाई पानी के लिए होगी। 

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि, ‘ध्यान रहे कि आग पानी में भी लगती है, और कोई आश्चर्य नहीं, कि अगला विश्वयुद्ध पानी के मसले पर हो.’

पानी की हमारी ज़िंदगी में एक बड़ी अहमियत है, और इस संबंध में सभी धर्मों ने, और सरकारों ने, और बुद्धिजीवियों ने, इस की एहमियत पर अपने-अपने विचार व्यक्त किए हैं, और सब के विचार इस बात की तरफ साफ़ इशारा करते हैं, कि पानी हमारे लिए बेहद ज़रूरी है।

भारत क्योंकि फ़लसफे का देश है, साहित्य का आँगन है, यहां सदियों पहले संस्कृत में पानी की एहमियत को समझाया है, "जल संरक्षणम् अनिवार्यम्" इसका अर्थ है, जल का संरक्षण अनिवार्य है, इसका स्टोरेज किया जाना हमारे लिए अनिवार्य है। 

इसके साथ ही रहीम जी पानी की एहमियत पर विस्तृत व्याख्या करते हैं, सारे संसार को इस संबंध में चेताते हैं:

"रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून":
रहीम जी कहते हैं, कि पानी को बचाकर रखना चाहिए, क्योंकि पानी के बिना सब कुछ खाली और अर्थहीन हो जाता है।

"पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून":
पानी के बिना मोती चमक खो देता है, मनुष्य प्रतिष्ठा खो देता है, और चूना अपनी कठोरता खो देता है। 

इस दोहे का सार यह है कि पानी (जल) के बिना जीवन संभव नहीं है। यह जीवन के लिए आवश्यक सभी चीजों का प्रतीक है, जिसमें सुंदरता, प्रतिष्ठा, और अस्तित्व शामिल हैं।

एक मशहूर दार्शनिक पानी के संबंध में लिखते हैं, "पानी का महत्व केवल वही लोग जानते हैं, जो इस को खो चुके होते हैं"

जल संरक्षण किया जाना ऐसे ही ज़रूरी है, जैसे हम अनाज या ज़रूरत की दूसरी चीज़ों का संरक्षण करके रखते हैं, इस तरह हमें पानी का भी संरक्षण करना चाहिए, लेकिन इस मामले में हम पूरी तरह से लापरवाह है। 

जब से शहरों में अंधाधुंध आधुनिक विकास हुआ है, और शहर के शहर कंक्रीट का ढ़ेर बनकर रह गए, तो जो तालाब, बावड़िया, कुएं या जो भी जल संरक्षण के साधन थे, उनको इस विकास ने अपनी चपेट में ले लिया, और इन सबको निगल गया।

अगर हम पुराने समय में देखें जहां पर राजा, महाराजाओं और मुगलों का शासन था, तो वहां पर जल संरक्षण के सारे साधन मौजूद थे, और यह साधन पानी की कमी से देशवासियों को बचाते थे।

क्योंकि अब शहरों में ना मैदान बाकी हैं, ना ही बाग बगीचे, सब के सब गायब हो चुके हैं, पुराने दिनों में इतना प्रदूषण भी नहीं था, लेकिन उसके बाद भी हर जगह खुलापन था। 

लेकिन अब सब कुछ सिमट गया है, और पॉल्यूशन लगातार बढ़ रहा है, अब इन सब उपायों की ज़्यादा ज़रूरत है, क्योंकि हर चीज़ की आबादी बढ़ने की वजह से डिमांड बढ़ रही है।

हमारे घरों से, मोटर वाहनों से, लघु और कुटीर उद्योगों से एक बड़ी मात्रा में प्रदूषण हमारी प्रकृति को दिया जाता है, प्रकृति हमें साफ चीज़ें देती है और हम उसे प्रदूषण।

क्या कभी हमने इस संबंध में सोचने की कोशिश करी, कि प्रकृति द्वारा दिया गया बेशकीमती तोहफा, सरकारों के द्वारा कितनी आसानी के साथ पानी हमारे घर में आता है, और हम नल चालू करते हैं, और जो भी हमारी ज़रूरत होती है उसको पूरा कर लेते हैं।

वरना आज भी कुछ लोगों का जीवन "जल युद्ध" के समान ही है, राजस्थान में कुछ जगहें ऐसी हैं, जहां पर औरतें और परिवार के लोग सुबह से लेकर शाम तक, सिर्फ पीने और इस्तेमाल करने के पानी का ही इंतज़ाम करने की कोशिश में मीलों का सफर तय करते हैं।

लेकिन हम लोग इस नेमत पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते, और पानी की खूब बर्बादी करते हैं, अगर ऐसा ही रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब हम एक-एक बूंद पानी के लिए तरसेंगे, और यह बात हम भारत में कुछ राज्य ऐसे हैं, जहां इस तरह की तस्वीरें देख सकते हैं, यह एक ज़िंदा मिसाल है।

IS1172-1971 के अनुसार, एक भारतीय शहर में सामान्य परिस्थितियों में घरेलू पानी की खपत 135 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन है, अगर हमारे परिवार में पांच लोग हैं, तो हम प्रतिदिन 500 लीटर पानी का इस्तेमाल करते हैं।

मार्केट में एक लीटर पानी की कीमत 20 रुपए की है, तो 500 लीटर पानी की कीमत 10,000 रुपए होगी, इस हिसाब से हम 30 दिनों में 3,00,000 रुपए का पानी इस्तेमाल करते हैं।

इसके साथ ही शहरों में फॉर्म हाउस का कल्चर बहुत तेज़ी से फैल रहा है, जहां स्विमिंग पुलों में हजारों और लाखों लीटर पानी की बर्बादी की जाती है, और इस बर्बादी की रोकथाम पर, कोई भी कारगर कदम नहीं उठाया जाता है।

जबकि हमार देश में कई शहर पानी की गंभीर कमी का सामना कर रहे हैं, कुछ शहर अपने जलाशयों और भूजल में "डे ज़ीरो" या बहुत कम जल स्तर का सामना कर रहे हैं। 

जो शहर सबसे ज़्यादा जल संकट का सामना करने वाले कुछ शहरों में बेंगलुरु, चेन्नई, इंदौर, मुंबई, लखनऊ, नागपुर, बठिंडा, हैदराबाद, पुणे और गुड़गांव शामिल हैं।

भारत के 10 करोड़ लोग पानी के लिए तरसेंगे, नदियों का देश कहलाने वाले भारत को लेकर नीति आयोग की रिपोर्ट डरावनी और चौंकाने वाली है।

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 तक देश में दस करोड़ लोग पानी की कमी की समस्या का सामना कर रहे होंगे. दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में लोग पानी के संकट से जूझेंगे। 

वहीं ‘ड्रॉट अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश का "बयालीस प्रतिशत" हिस्सा असमान्य सूखे से गुज़र रहा है, जिसमें तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।

इसके साथ ही यह समस्या सिर्फ हमारी ही नहीं है, बल्कि दुनिया भर के कई प्रमुख शहरों में "डे ज़ीरो" जल संकट का खतरा है, जहाँ उनकी नगरपालिका जल आपूर्ति समाप्त हो गई है। 

इस तरह के संकट का सामना करने वाले कुछ शहरों में बीजिंग, काहिरा, इस्तांबुल, जकार्ता, लंदन, मियामी, मॉस्को, साओ पाउलो और टोक्यो शामिल हैं। 

केप टाउन और मेक्सिको सिटी पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं, या वर्तमान में इसका सामना कर रहे हैं।

इसके लिए संसारवासियों को देशवासियों को सोचने की ज़रूरत है, और हम किन उपायों से पानी का इस्तेमाल कम कर सकते हैं, और इसकी बर्बादी को रोक सकते हैं, क्योंकि यह हमारे हाथ में है।

वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम एक बहुत ही सरदार तरीका है, बारिश के पानी विभिन्न तरीकों से ज़मीन में जमा करके, जैसे कि पुनर्भरण कुओं या बावड़ियों के द्वारा, पानी की भरपाई की जाती है, और भूजल स्तर को बढ़ाने में मदद मिलती है। 

यह प्रक्रिया, जिसे कृत्रिम पुनर्भरण के रूप में भी जाना जाता है, उन क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रभावी हो सकती है, जहाँ अत्यधिक उपयोग के कारण भूजल स्तर में गिरावट आ रही है।

इस्लाम में 1400 साल पहले हमको पानी के कम इस्तेमाल और पानी की बर्बादी से बचने की सख़्त हिदायत दी गई है, ”आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “वुज़ू में पानी फ़ुज़ूल ख़र्च न करो, चाहे तुम नदी के किनारे वुज़ू कर रहे हो.”

यहां पर गौर वाली बात यह है, कि अगर हम नदी के किनारे पर पानी का इस्तेमाल करेंगे, तो वह पानी नदी में ही चला जाएगा, लेकिन फिर भी हमको नदी पर भी उतना ही पानी इस्तेमाल करने की हिदायत दी जा रही है, जितना हमारे लिए ज़रूरी है।

इसके साथ ही हमें अगर हमें पानी जैसी इस कीमती धरोहर को खत्म होने से बचाना है, तो सरकारों को देशवासियों को लोगों के लिए पीने के पानी का इंतज़ाम करना चाहिए, चौपायों के लिए पीने के पानी का इंतज़ाम करना चाहिए, परिंदों के लिए पीने के पानी का इंतज़ाम करना चाहिए।

क्योंकि अगर हम ज़मीन वालों पर रहम करेंगे, तो आसमान वाला हम पर ज़रूर रहम करेगा