बिहार का SIR और ख़ामोश कर दिए गए नौजवान
“ _क्या होता है जब लाखों नौजवान अपनी पहली वोट डालने से पहले ही वोटर लिस्ट से ग़ायब कर दिए जाते हैं_ ?”
जश्न-ए-जम्हूरियत या साज़िश-ए-ख़ामोशी?
बिहार चुनाव के मुहाने पर खड़ा है। मगर जश्न-ए-जम्हूरियत मनाने के बजाय, लाखों नौजवान अपनी पहचान मिटाई हुई पा रहे हैं।
SIR, जिसे वोटर लिस्ट सुधारने के लिए बनाया गया था, आज नौजवानों की आवाज़ दबाने का ज़रिया बन गया है।
“हक़ छीन लिया गया, तोहमत भी हम पर,
जम्हूरियत का नाम है मगर खेल किसी और का।”
आंकड़ों की ज़ुबान
35 लाख नाम हटाए गए: NDTV और Hindustan Times के अनुसार चुनाव आयोग ने माना कि 3.56 करोड़ मतदाताओं में से 35.69 लाख को उनके पते पर नहीं पाया गया ।
65 लाख नाम ड्राफ़्ट रोल से हटाए गए: टाइम्स ऑफ़ इंडिया और इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार SIR की ड्राफ्ट लिस्ट से 65.64 लाख नाम हट गए, जिससे कुल मतदाता संख्या 7.24 करोड़ पर सिमट गई।
20 लाख पहली बार वोटर गायब: The Wire की पड़ताल बताती है कि करीब 20.6 लाख नए, पहली बार वोट डालने वाले युवाओं को लिस्ट से बाहर कर दिया गया।
कुछ इलाक़ों में, Reporter’s Collective की जांच के अनुसार, हज़ारों डुप्लीकेट और ग़ैर-मुक़ीम (outsider) वोटर भी शामिल किए गए- सिर्फ़ वाल्मीकिनगर में ही 5,000 से ज़्यादा संदिग्ध डुप्लीकेट वोटर पाए गए।
ये सब इत्तेफ़ाक़ नहीं लगते, बल्कि एक सियासी मंशा की निशानी हैं।
नौजवान: सब से बड़ा शिकार
बिहार की आबादी का 58 फ़ीसद नौजवान है। 2025 में क़रीब 1 करोड़ पहली बार वोटर थे। मगर बहुतों के नाम लिस्ट से ग़ायब।
बेरोज़गारी और रोज़गार के लिए हिजरत (migration) तो पहले से थी।
अब वोट का हक़ भी छिन गया।
“जिसे आवाज़ मिलनी थी, उसे ख़ामोश कर दिया गया,
जिसे उम्मीद थी, उसी से कल का हक़ छीन लिया गया।”
हुकूमत की ख़ामोशी
हुकूमत ने EC की सफ़ाई का साथ दिया, लेकिन नौजवानों के हक़ की हिफ़ाज़त नहीं की।
सुप्रीम कोर्ट को याद दिलाना पड़ा कि सिर्फ़ आधार कार्ड से शहरी (citizenship) साबित नहीं होती।
इस दरमियान, हुकूमत के बड़े रहनुमा पुल और पावर प्लांट का उद्घाटन करते रहे। सवाल ये है — क्या ये तरक़्क़ी तब मायने रखती है जब नौजवान ही वोट से बाहर कर दिए जाएं?
जम्हूरियत पर हमला
SIR सिर्फ़ एक टेक्निकल मसला नहीं, बल्कि ये सीधा सवाल है:
किसका नाम काटा गया?
किसका नाम जोड़ा गया?
और क्यों?
जब हुकूमत इन सवालों से बचती है, तो शक और गहरा होता है।
“नाम लिस्ट से मिटाना आसान है,
मगर नौजवान की चीख़ कैसे दबाओगे?”
नतीजा और पैग़ाम
आज बिहार का नौजवान दोहरी मायूसी में है - रोज़गार से महरूम, वोट से महरूम।
वोटर लिस्ट महज़ एक काग़ज़ नहीं, बल्कि वादा है कि हर शहरी की आवाज़ मायने रखती है। जब ये वादा टूटता है, तो जम्हूरियत की रूह ज़ख़्मी होती है।
बिहार का नौजवान अब सिर्फ़ रोज़गार नहीं, बल्कि अपने हक़ की मांग कर रहा है:
रोज़गार का हक़,
इज़्ज़त का हक़,
और सबसे बढ़कर वोट का हक़।
“कल का बिहार उसी का होगा,
जिसकी आवाज़ आज दबाई न गई हो।”
~इंजीनियर औरंगज़ेब आज़म