हबीब तनवीर का जन्म 1 सितम्बर 1923 को रायपुर (छत्तीसगढ़) में हुआ। उनका असली नाम हबीब अहमद खान था। उनके पिता हकीम थे और घर का माहौल तालीमी भी था और धार्मिक भी। लेकिन हबीब तनवीर बचपन से ही कविता, गाने और नाटक की तरफ़ खिंचते थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि वे बचपन में ही ताली बजाकर और कव्वालियों में सुर मिलाकर अपने मोहल्ले में पहचान बनाने लगे थे।

शिक्षा-

उन्होंने नागपुर और अलीगढ़ से पढ़ाई की, फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से इंग्लिश में ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई के दौरान ही वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े और कविताएँ लिखने लगे। इसी दौरान उन्होंने अपना तख़ल्लुस तनवीर रखा।

कला का सफ़र-

1940 के दशक में वे ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली से जुड़े और पटकथाएँ लिखीं।

1950 के दशक में वे इंग्लैंड और जर्मनी गए और वहाँ रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स (लंदन) और ब्रेक्टियन थिएटर (बर्लिन) से थिएटर की बारीकियाँ सीखीं।

वहाँ का अनुभव उन्होंने भारतीय लोक रंगमंच से जोड़ा। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता बनी।


नया थिएटर और छत्तीसगढ़ी कलाकार
1959 में उन्होंने नया थिएटर की स्थापना की। इसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ के गली-मोहल्लों से लोक कलाकारों को शामिल किया। उस समय लोग हैरान थे कि कैसे एक बड़े विचारक और अंतरराष्ट्रीय रंगमंच से जुड़ा शख़्स अनपढ़ ग्रामीण कलाकारों के साथ काम कर रहा है।


लेकिन हबीब तनवीर कहते थे -
 “मेरे असली उस्ताद ये गाँव के कलाकार हैं, मैं तो सिर्फ़ मंच तैयार करता हूँ।”


नाटकों की ख़ासियत-

“आगरा बाज़ार” (1954) ने पहली बार आम लोगों को मंच पर उतारा। इसमें प्रोफेशनल कलाकार नहीं, बल्कि ठेले वाले, रिक्शेवाले, और लोक गायक शामिल हुए।

“चरणदास चोर” (1975) को एडिनबर्ग फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय नाटक का पुरस्कार मिला।

उनके नाटकों में लोकगीत, चुटकुले, सामाजिक व्यंग्य और आम बोलचाल की भाषा बड़ी ख़ूबसूरती से मिलती थी।


कम लोग जानते हैं कि…

1. हबीब तनवीर को बचपन में उर्दू शायरी का बहुत शौक था और वे खुद ग़ज़लें लिखते थे।


2. वे अच्छे गायक भी थे और अपने नाटकों में कभी-कभी खुद सुर लगाते थे।


3. वे मंच पर हमेशा सरल कपड़े पहनते थे- अक्सर सफेद कुर्ता-पायजामा। उनका मानना था कि कलाकार का रूप मंच से ज़्यादा बड़ा नहीं होना चाहिए।


4. उन्होंने फ़िल्मों में भी काम किया — “जाने भी दो यारो”, “गाँधी”, और “भारत एक खोज” जैसी कृतियों में उनका योगदान रहा।


5. वे राजनीति और समाज पर खुलकर बोलते थे। नतीजा यह हुआ कि कई बार उनके नाटकों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश भी हुई।



सम्मान और उपलब्धियाँ -

1969: संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

1983: चरणदास चोर को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार

1990: कालिदास सम्मान

2002: पद्म भूषण


अंतिम समय-

हबीब तनवीर आख़िरी समय तक सक्रिय रहे। उनकी उम्र 80 पार हो चुकी थी, फिर भी वे गाँव-गाँव जाकर नाटक कराते थे।
8 जून 2009 को भोपाल में उनका निधन हुआ। उनके अंतिम संस्कार में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के सैकड़ों लोक कलाकार रोते हुए शामिल हुए।


मेरी नज़र से -

हबीब तनवीर सिर्फ़ एक नाटककार नहीं थे, बल्कि लोक संस्कृति और आधुनिक रंगमंच के सेतु थे। उन्होंने दिखाया कि कला सिर्फ़ अभिजात वर्ग की नहीं होती, बल्कि गली-कूचों, चौपालों और आम जनता की होती है।


लेखन फैजुद्दीन खान  
प्रधान संपादक - न्यूज मोहल्ल