इंदौर का सीतलामाता बाज़ार, जो रात होते ही रोशनी और चहल-पहल से भर उठता था, अब अचानक चर्चा का विषय बन गया है। जिस बाज़ार की सड़कों पर पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता था, वहाँ बीती रात सन्नाटा पसरा रहा।

मार्केट में सन्नाटा

भीड़-भाड़ से सन्नाटे तक

सीतलामाता बाज़ार, कल्लथ मार्केट और बर्तन बाज़ार में रोज़ाना शाम 7 बजे से लेकर रात 9 बजे तक खचाखच भीड़ रहती थी। ग्राहक दुकानों पर bargaining करते, बच्चे आइसक्रीम और खिलौनों के साथ दौड़ते, तो दुकानदार ग्राहकों को आवाज़ लगाते। लेकिन इस बार नज़ारा बिल्कुल उल्टा था।

दुकानदारों को बार-बार आवाज़ लगानी पड़ी, पर ग्राहक बहुत कम आए। जहाँ पैदल चलने की जगह तक नहीं मिलती थी, वहाँ सड़कें सुनसान दिखाई दीं। दुकानों के आगे लगी भीड़ की जगह अब गाड़ियों और सन्नाटे का राज था।

विवाद की वजह क्या?

कुछ दिनों पहले से बाजार में एक बड़ा विवाद खड़ा हुआ। हिंदू संगठनों और स्थानीय नेताओं की ओर से बयान आया कि बाज़ार में मुस्लिम कर्मचारियों और किरायेदारों को जगह न दी जाए। कहा गया कि अगर किसी दुकान में मुस्लिम कर्मचारी काम कर रहा है, तो उसे हटाना होगा।

इस फैसले के बाद से मुस्लिम ग्राहकों ने भी बाजार से दूरी बना ली। नतीजा यह हुआ कि जो बाजार हमेशा मुस्लिम और हिंदू ग्राहकों की मिली-जुली भीड़ से गुलजार रहता था, वहाँ ग्राहकों की कमी साफ दिखने लगी।

दुकानदारों की चिंता
चिन्ता में व्यापारी

दुकानदारों का कहना है कि इससे सबसे बड़ा नुकसान व्यापार को हुआ है। एक ग्राहक को सिर्फ़ धर्म से नहीं, बल्कि खरीदार के नज़रिये से देखना चाहिए। अगर ऐसा माहौल बना रहा, तो त्यौहारों का सीजन भी फीका पड़ सकता है।

 सवाल खड़े होते हैं

क्या धर्म के आधार पर बाज़ार और रोज़गार में बंटवारा होना चाहिए?

क्या बहिष्कार की राजनीति से आम दुकानदार और मज़दूर सबसे ज़्यादा नहीं पिसेंगे?

और सबसे अहम - क्या बाज़ार की रौनक सिर्फ मिलजुल कर ही नहीं लौट सकती?