हज 2026: कुर्रा के बाद ₹1.52 लाख एडवांस जमा की डेडलाइन 25 अगस्त, सवालों के घेरे में हज कमेटी का फैसला
भोपाल (न्यूज़ मोहल्ला)
सेंट्रल हज कमेटी ऑफ इंडिया (HCoI) ने हज 2026 (1447 हिजरी) की प्रक्रिया तेज़ कर दी है। 13 जुलाई 2025 को कुर्रा (डिजिटल चयन) के नतीजे घोषित किए गए और चयनित हाजियों से ₹1,52,300 अग्रिम जमा करने के लिए कहा गया है। यह राशि 25 अगस्त 2025 तक जमा करनी होगी।
कितनी राशि, किसके लिए?
कमेटी ने प्रति हाजी ₹1,52,300 की डिमांड की है, जिसमें—
₹1,50,000 एडवांस
₹2,000 विविध खर्च
₹300 नॉन-रिफंडेबल प्रोसेसिंग फी शामिल है।
भुगतान ऑनलाइन पोर्टल/हज सुविधा ऐप या एसबीआई और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की अधिकृत शाखाओं में रेफरेंस नंबर के साथ किया जा सकता है।
डेडलाइन और अवकाश का मसला
भुगतान की अंतिम तिथि 20 अगस्त 2025 तय की गई है। इस दौरान
15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस (राष्ट्रीय अवकाश),
16 अगस्त को कई राज्यों में जन्माष्टमी,
17 अगस्त रविवार होने से बैंक बंद रहेंगे।
यानी, नकद/शाखा के माध्यम से भुगतान करने वालों को केवल सीमित कार्य-दिवस मिलेंगे। हालाँकि, ऑनलाइन पेमेंट 24×7 उपलब्ध रहेगा।
हज यात्रा की संभावित तारीखें
सऊदी अरब की आधिकारिक घोषणा के अनुसार हज की तारीख़ चाँद देखने पर निर्भर करती है। खगोलीय अनुमान के मुताबिक, हज 2026 की रस्में 24 से 29 मई 2026 के बीच अदा की जाएंगी।
विवाद कहाँ है?
हज कमेटी ने कहा है कि यह रकम रिफंडेबल होगी और आगे की दो किस्तें भी अलग से तय समय पर जमा कराई जाएंगी। लेकिन सवाल उठ रहे हैं:
क्या हज जैसी धार्मिक यात्रा के लिए 8 महीने पहले भारी रकम जमा कराना जायज़ है?
30 अरब रुपए से अधिक की अग्रिम राशि का इस्तेमाल कैसे होगा?
बैंक में जमा इस राशि पर मिलने वाले ब्याज (इंटरेस्ट) को लेकर धार्मिक बहस है, क्योंकि इस्लाम में ब्याज हराम माना गया है।
अभी तक HCoI की आधिकारिक गाइडलाइंस में “ब्याज का उपयोग” लिखित रूप से दर्ज नहीं है, लेकिन आशंकाओं ने बहस छेड़ दी है।
फायदे (समर्थन करने वालों के तर्क)
अग्रिम राशि से टिकट, होटल और अन्य इंतज़ाम समय पर हो पाएंगे।
एडवांस बुकिंग से हाजियों को बेहतर सुविधाएँ मिल सकती हैं।
रकम रिफंडेबल बताई गई है, इससे भरोसा बना रहेगा।
सरकार और कमेटी पर अचानक वित्तीय दबाव नहीं पड़ेगा।
नुकसान (विरोध करने वालों के तर्क)
गरीब और मध्यमवर्गीय हाजियों के लिए 8 महीने पहले इतनी बड़ी राशि जुटाना मुश्किल है।
जमा होने वाले अरबों रुपए और ब्याज के उपयोग पर पारदर्शिता की कमी है।
बैंक अवकाश के बीच केवल 3–4 कार्य दिवस मिलने से कई हाजियों के लिए परेशानी।
हज जैसी मुक़द्दस यात्रा में “ब्याज” का मुद्दा धार्मिक रूप से संवेदनशील है।
सीधे सवाल
1. क्या हज जैसी पवित्र यात्रा में अग्रिम बड़ी रकम लेना हाजियों पर अनुचित आर्थिक बोझ है?
2. क्या जमा राशि पर मिलने वाला ब्याज धार्मिक सिद्धांतों के खिलाफ जाएगा?
3. क्या हज कमेटी को जमा राशि के उपयोग और ब्याज पर स्पष्ट पारदर्शिता नहीं दिखानी चाहिए?
4. क्या डेडलाइन को लंबा करके हाजियों को अधिक समय देना उचित नहीं होता?
निष्कर्ष
हज कमेटी का कहना है कि यह कदम यात्रा की तैयारी को आसान बनाने के लिए है। लेकिन अग्रिम 30 अरब रुपए की राशि, सीमित कार्य-दिवस, और ब्याज से जुड़ी धार्मिक बहस ने इस फैसले को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।
अब नज़र इस बात पर है कि कमेटी इन शंकाओं का कितना स्पष्ट और पारदर्शी जवाब देती है।
न्यूज मोहल्ला ..
एडिटर इन चीफ - फैजुद्दीन खान
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