कुछ दिनों पहले पहलगाम में एक आतंकी हमला हुआ, जिसमें 27 निर्दोष लोगों की जाने गई, जो कि कश्मीर घूमने के लिए गए थे।

इसके बाद भारत की तरफ से पाकिस्तान में बसने वाले आतंकी स्थलों पर कार्यवाही की गई, उसके जवाब में पाकिस्तान द्वारा भारत पर कार्यवाही की गई।

दोनों देशों के बीच अत्यंत तनाव की स्थिति निर्मित हो गई, और हालात एक बड़ी जंग की तरफ रूख लेने लगे, लेकिन इस बीच में दोनों देशों ने बातचीत का रास्ता अपनाया, और सीज़फायर दोनों देशों के बीच में हो गया।

इस बीच में भारत की एक बेटी जिसने अपनी उपस्थिति को दर्ज करवाया और न केवल दर्ज करवाया बल्कि सारी दुनिया के सामने एक सितारा बनकर चमकी। 

देश की उस बेटी का नाम सोफिया कुरैशी है, जोकि भारतीय सेना में एक वरिष्ठ अधिकारी हैं, जो वर्तमान में कर्नल के पद पर हैं, वह संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में भारतीय दल का नेतृत्व करने वाली पहली महिला होने के लिए उल्लेखनीय हैं। 

और उन्होंने 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान अपनी नेतृत्वकारी भूमिका के लिए राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित कर चुकी हैं।

जैसा की न्यूज़ मोहल्ला ने सोफिया कुरैशी और उनके पूरे खानदान के बारे में जानकारी दी है कि उनकी पीढ़ियां देश सेवा से जुड़ी हुई है और अभी भी देश की सेवा यह लोग कर रहे हैं। 

लेकिन हैरानी की बात है, मध्य प्रदेश के एक मंत्री विजय शाह द्वारा सोफिया कुरैशी के धर्म और जाति के संबंध में विवादित बयान दिया गया। 

जिस पर मंत्री विजय शाह के नाम पर थाने में एफआईआर दर्ज की गई और सभी देशवासियों ने मंत्री विजय शाह के इस विवादित बयान को निंदनीय बताया।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने तुरंत संज्ञान लेकर मंत्री विजय शाह के इस विवादित बयान की निंदा की, और मंत्री विजय शाह को सख़्त हिदायत दी, कि वह पब्लिक फिगर है, इस तरह की गैर ज़िम्मेदार टिप्पणियों से उन्हें बचना चाहिए।

काश ऐसा ही हर भारतीय के मामले में हमारी अदालतें व्यवहार करें, और अगर किसी भी भारतीय की जान और माल, इज़्ज़त और आबरू से जुड़ा मुद्दा हो, तो उस पर तत्काल न्यायिक कार्यवाही की जाए, और दोषियों को सज़ा दी जाए।

हर व्यक्ति को एक समान माना जाए, और सबको एक दृष्टि से देखा जाए।

क्योंकि हमारा भारतीय संविधान हर एक को एक समान मानता है, और कानून की दृष्टि में हम सब एक बराबर हैं, इन निम्नलिखित धाराओं के द्वारा हम समानता के अधिकार को समझ सकते हैं। 

तो हमारे संविधान में समानता को संबोधित करने वाले अनुच्छेद निम्न लिखित हैं:

अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है।

अनुच्छेद 15 धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है।

अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता सुनिश्चित करता है।

अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है।

इसी संबंध में समानता पर संस्कृत में भी कई श्लोक मौजूद हैं:

सर्वे सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥

अर्थ: सभी सुखी रहें, सभी स्वस्थ रहें। सभी को अच्छाई मिले और कोई भी दुखी न हो।

परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।

अर्थ: दूसरों की सेवा करना पुण्य है, और दूसरों को कष्ट देना पाप।

येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः। ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।। 

अर्थ: जिसके पास विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील, गुण और धर्म में से कुछ नहीं है, वह मनुष्य रूप में भी पशु के समान जीवन व्यतीत करता है। 

आत्मनः विरोधानि परेषां न समाचरेत्। यः समसत्वमाप्नोति न स मुच्यते कर्मभिः॥

अर्थ: दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जो स्वयं के लिए प्रतिकूल हो। जो व्यक्ति समता को प्राप्त हो जाता है, वह कर्मों में नहीं उलझता। 

संक्षेप में, ये श्लोक मानवता के मूल्यों जैसे कि प्रेम, सेवा, दया, और दूसरों के प्रति सम्मान पर जोर देते हैं।

पिछले लगभग बीस से पच्चीस सालों के दौरान ऐसा देखने में लगातार आ रहा है, कि कुछ राजनेता अपनी राजनीति को चमकाने के लिए हेट स्पीच का इस्तेमाल करते हैं, और समाज में अराजकता फैलाते हैं।

यह राजनेता किसी धर्म के खिलाफ, किसी जाति के खिलाफ, किसी लिंग के खिलाफ, लगातार नफरत फैलाते हैं, और उसका असर हमारे समाज को भुगतना पड़ता है, क्योंकि हम अपने आसपास जिन चीजों को होते हुए देखते हैं, वैसे ही व्यवहार हम करने लगते हैं।

हालांकि हम किसी भी राजनेता का चयन इसलिए नहीं करते, कि वह दूसरे धर्म या जाति या लिंग को टारगेट करेंगे, बल्कि हम किसी भी राजनेता का चुनाव हमारे जीवन में आसानी हो। 

हमें समान अवसर मिले, हमें रोज़गार मिले, हम अच्छा कारोबार कर सकें, हमारे आसपास अच्छा माहौल हो, हमारे शहर में देश में कानून और व्यवस्था बेहतर हो, इसके लिए हम एक राजनेता को चुनाव करते हैं।

लेकिन दुर्भाग्य से पिछले कुछ समय से लोगों को पोलराइज़ किया जा रहा है, जो की एक शब्द समाज के लिए एक संपन्न देश के लिए ठीक नहीं है।

राजनेता हमको सेवाएं देता है, जब वह अपने पद पर विराजमान होता है, तो जो उसके कर्तव्य है, उनका पालन करता है,क्योंकि इतनी बड़ी आबादी होने के बाद भी हम दुनिया में बहुत पीछे हैं।

हमारे देश पर वर्ल्ड बैंक का लगातार कर्ज बढ़ता जा रहा है, हमारे यहां महंगाई बढ़ती जा रही है, युवाओं में बेरोजगारी चरम पर है।

हमारी विडंबना यह है, कि जो हमारा पढ़ा लिखा नौजवान वर्ग है, वह हमारे देश में अवसर नहीं मिल पाने की वजह से दूसरे देशों में नौकरी करने के लिए जाता है, और हमारे देश की धरोहर दूसरे देशों को फायदा पहुंचाती है, यह बड़ा ही चिंता का विषय है, इस पर सोचने की ज़रूरत है।

इतनी बड़ी आबादी के बाद भी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स ना की बराबर है, हमारे यहां अपराध बढ़ता जा रहा है, जिसके लिए कठोर और कारगर कदम उठाए जाने की ज़रूरत है।

हमारे देश में भेदभाव और पूर्वाग्रह बढ़ता जा रहा है, लगातार लिंचिंग के मामले बढ़ते जा रहे हैं, एक विशेष समुदाय को लगातार कुछ अतिवादी मानसिकता के लोगों के द्वारा, आम लोगों को पकड़ के नारे लगवाए जा रहे हैं, उनको दूसरे देश जाने के लिए बोला जा रहा है।

अपराधियों के दिल में से कानून का डर निकलता जा रहा है, एक विशेष विचारधारा के लोग एक औरत के साथ सामूहिक बलात्कार करके, उसके पेट में पल रहे  बच्चे का कत्ल करते हैं, जब जेल से बाहर आते हैं, तो लोग फूल मालाओं से मिठाई से उनका स्वागत करते हैं। 

सख्त अफसोस है, हम किस दिशा में जा रहे हैं यह तो बर्बादी का रास्ता है।

जो की राजनीतिक विचारधारा से संबंध रखते हैं, इनका किसी भी धर्म से कोई संबंध नहीं है, उनके द्वारा टारगेट किया जा रहा है, क्योंकि कोई भी धर्म इंसान के खिलाफ नहीं है, बल्कि एक इंसान दूसरे इंसान के खिलाफ है, उसकी विचारधारा की वजह से। 

हमारे राजनेताओं के लिए, प्रशासन के लिए यह बेहद चिंता का विषय है, कि अब अगर भारत में कोई त्यौहार आता है, तो आमजन को टेंशन होती है।

कि इससे हमारे शहर में अराजकता फैलेगी, फसाद होगा, दंगे होंगे, क्या त्यौहार इसलिए आते हैं, कि हम एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो जाए, नहीं भाइयों त्यौहार सिर्फ प्रेम भाव बढ़ाने के लिए आते हैं।

लेकिन आज स्थिति इतनी खराब हो चुकी है, कि धार्मिक स्थलों को पॉलिथीन के द्वारा सुरक्षित किया जा रहा है, क्योंकि कुछ अतिवादी लोग दूसरे के धर्म के धर्म स्थलों को निशाना बना रहे हैं, उनको तोड़ रहे हैं।

दूसरे के धर्म को लोगों को देखकर गालियां दे रहे हैं, खुले आम हथियारों को लहरा रहे क्या यह देश का विकास है?

इसके साथ ही इस्लामोफोबिया के तहत अगर कोई भी आतंकवादी घटना होती है, तो उसको इस्लाम से जोड़कर देखा जाता है, जिन लोगों ने कोई गुनाह नहीं किया, उनको सिर्फ उनके धर्म और जाति की वजह से कटघरे में खड़ा किया जाता है, बल्कि मुजरिम ठहराया जाता है, यह कैसा इंसाफ है, यह कैसी सोच है?

और बार-बार यह सवाल पूछा जाता है, कि हर आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होता है?

इसका जवाब यही है कि आतंकवाद से इस्लाम का कोई संबंध नहीं है और हर मुसलमान आतंकवादी ही क्यों होता है इसका जवाब यह है।

कि हर मूर्ख एक इंसान होता है, लेकिन हर इंसान एक मूर्ख नहीं होता।

लिए हम देखते हैं कुरान इस संबंध में क्या कहता है, कुरान की एक आयत है, जो कहती है कि जिसने किसी बेगुनाह की जान ली, उसने सारी इंसानियत की जान ली, यह आयत मानव जीवन की पवित्रता और महत्व पर जोर देती है।

कुरान में यह भी कहा गया है कि जिसने एक व्यक्ति की जान बचाई, मानों उसने पूरी इंसानियत को बचा लिया, यह आयत मानव जीवन के महत्व और करुणा के महत्व पर जोर देती है,. 

कुरान में कहा गया है, कि जिसने एक बेकसूर का कत्ल किया, उसने पूरी इंसानियत का कत्ल कर दिया,. वहीं, जिसने एक व्यक्ति की जान बचा ली, मानों उसने पूरी इंसानियत को बचा लिया,. 

जिसने किसी एक इंसान की जान बचाई, गोया उसने सारी इंसानियत की जान बचाई
(क़ुरआन 5:32) 

"एक निर्दोष इंसान का कत्ल सारी इंसानियत का कत्ल है".

और जो लोग भी आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते हैं, उनका इस्लाम से कोई भी संबंध नहीं है, वह सिर्फ इस्लाम का नाम इस्तेमाल करते हैं, इससे वह अपना निजी स्वास्थ्य सिद्ध करते हैं।

अब हम अपने लेख में समापन की तरफ बढ़ रहे हैं और इसका समापन हम एक विनती के साथ करेंगे जो कि अदालतों के लिए है। 

कि वह हर व्यक्ति को एक ही दृष्टि से देखे किसी को बाद किसी को छोटा नहीं देखें क्योंकि हमारा संविधान हम सबको एक समान मानता है हम सबको बराबर के अधिकार मिले हम सब अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें और अपने देश को मज़बूत बनाएं।

आम जनता से सिर्फ इतना ही कहना है कि वह मिलजुल कर रहे हैं राजनेताओं के द्वारा दिए जा रहे भाषणों में से जो हमारे लिए बेहतर है उसको चुने और राजनेताओं को जो हमने काम सोपा है सिर्फ उनसे वही सवाल किया जाए। 

क्योंकि यह राजनेता जब हमारे पास वोट मांगने के लिए आते हैं, तो अपनी झोली फैलाते हैं, और हमसे वादा करते हैं कि वह हमारी तकलीफों को दूर करेंगे। 

यह हमसे वादा करते हैं कि हमारे क्षेत्र में विकास करेंगे तो जो इनका कार्य है जिसके लिए हमने इनको नियुक्त किया है हमें सिर्फ इसे इस विषय पर बात करना चाहिए कि अपने विकास का वादा किया था, उसका क्या स्टेटस है? 

क्योंकि यह हमको ग़ैर ज़रूरी मुद्दों में उलझा देते हैं, और हम अपने असल मुद्दों को भूल ही जाते हैं, और समय गुज़रता जाता है, राजनेता साधन संपन्न होते जाते हैं, और जनता साधन हीन होती जाती है।