आज बात एक फिल्म के संबंध में, जो कि 25 अप्रैल 2025 को रिलीज़ हुई है, जो कि एक सत्य घटना पर आधारित है, इसमें एक पति और पत्नी के त्याग और संघर्ष की कहानी है.
कि किस तरह इस दंपती ने समाज को सुधारने के लिए, सबसे सशक्त माध्यम का चुनाव किया, जोकि शिक्षा है, इस फिल्म का नाम "फूले" है।
दरअसल शिक्षा हम सभी को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के संबंध में अवगत कराती है, क्योंकि जब तक हमको अपने अधिकारों और कर्तव्यों के संबंध में जानकारी नहीं होगी.
तब तक हम अपने समाज के लिए "संपत्ति" की जगह "दायित्व" बने रहेंगे, और जैसे ही हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों के संबंध में जानकारी होगी तब हम दायित्व से संपत्ति बन जाएंगे।
इस मूवी के संदेश को समझने और समझाने के लिए हमें कुछ बातों को समझना, हम सभी के लिए बहुत ज़रूरी है, क्योंकि इन बातों को समझे बिना, इस मूवी के संदेश को समझ पाना संभव नहीं है,
सिनेमा के संबंध में कहा जाता है, कि यह समाज का दर्पण है, इस कथन का मतलब ये है, कि जैसा समाज होता है, वैसा ही सिनेमा होता है, हालांकि समाज हम इंसानों के द्वारा बनाया जाता है, यह अपने आप नहीं बनता।
ख़ैर इसलिए सिनेमा किसी भी तरह के, कोई भी काल्पनिक किरदार या काल्पनिक दुनिया के संबंध में बात नहीं करता है, बल्कि इसमें जो भी कहानियां दिखाई जाती हैं, उनका किसी न किसी वास्तविक जीवन, किसी किरदार या घटना से सीधा संबंध होता है।
इस फिल्म की कहानी समाज में मौजूद उपेक्षित वर्ग की है, जिन लोगों का संबंध भारत से है, दुर्भाग्य से सत्ता को हथियाने, और उस पर कब्ज़ा जमाए रखने के लिए, हमारे समाज को दो टुकड़ों में विभाजित किया गया है।
पहला ग़रीब और दूसरा अमीर, जहां ग़रीबों के पास बुनियादी सुविधाएं साधन मौजूद नहीं है, शिक्षा नहीं है, स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं नहीं है, पीने के लिए साफ पानी नहीं है, बच्चों को खिलाने के लिए खाना नहीं है, उनके बच्चे कुपोषित है।
एक बड़ी आबादी के पास रहने के लिए मकान नहीं है, इन लोगों की बस्तियों में और इनके आसपास गंदगियों का ढेर है, इन लोगों के पास तन ढांकने के लिए कपड़े नहीं है, इनकी बस्तियों में तंबाकू है, गुटका है, शराब है, हर तरह का नशा है, लेकिन स्कूल और अस्पताल नहीं है।
इसके साथ ही ये बात भी ध्यान देने योग है, कि भारत में जो बड़े राज्य हैं, वहां पर सबसे ज्यादा गरीबी है, और इन्हीं राज्यों में शिक्षा की दर सबसे कम है, स्कूल कम है, और टीचर भी कम है।
लेकिन बड़े अफसोस की बात है, कि इन बड़ी आबादी वाले राज्यों में सुबह-शाम सिर्फ मंदिर मस्जिद की बात हो रही है, और देखने वाली बात यह है, कि यहां पर क्राइम बहुत तेज़ी के साथ बढ़ रहा है।
जितनी भी वेब सीरीज़ अभी बन रही हैं, उनमें इन्हीं प्रदेशों को दिखाया जा रहा है, और यह साबित किया जा रहा है, कि इन प्रदेशों में सिर्फ गुंडागर्दी और मारकाट ही होती है।
और किस तरह राजनेता बाहुबलियों को संरक्षण देते हैं, इससे समाज में यही संदेश जाएगा, कि आम युवा को भी इसी तरह का जीवन जीना चाहिए, क्योंकि इन राज्यों में बेरोज़गारी भी काफ़ी ज़्यादा है।
हालांकि समाज के इस उपेक्षित वर्ग को अपडेट और अपग्रेड करने के लिए हर सरकार के द्वारा इस वर्ग विशेष के अपलीटमेंट के लिए अनेक प्रकार की योजनाएं चलाई जाती हैं।
लेकिन राजनेता और नौकरशाही उन योजनाओं को सिर्फ कागज़ों पर दिखा कर, उन पैसों का घोटाला कर लेते हैं, और जिनको आवश्यकता है, उन तक वह राशि नहीं पहुंच पाती है, जो सरकार द्वारा आवंटित होती है।
हर देश में मौजूद सरकारें कमज़ोर तबके के उद्धार के संबंध में आरक्षण भी देती है, ताकि समाज में एक बैलेंस बना रहे, ताकि ग़रीब बहुत ग़रीब ना होता जाए, इस आरक्षण के संबंध में जनरल कैटेगरी के लोग हमेशा नाराज़ रहते हैं।
कि उनसे कम अंक वालों को एडमिशन मिल गया, और वह सिलेक्ट नहीं हो पाए, लेकिन जहां पर जनरल कैटेगरी वालों का संघर्ष खत्म होता है, वहां से इस आरक्षित वर्ग का संघर्ष शुरू होता है।
अगर हम समाज में मौजूद साधन संपन्न लोगों का अध्ययन करेंगे, तो हम पाएंगे, कि उनको साधन संपन्न बनाने वाली चीज़ शिक्षा है, क्योंकि इसको ग्रहण करते ही वह अपने अधिकारों के संबंध में जागृत हो जाते हैं।
"शिक्षा" इसको ग्रहण करने वाले के लिए, चारों तरफ से समृद्धि के द्वार खोल देती है, इस व्यक्ति को असंख्य मात्रा में अवसर उपलब्ध करवाती हैं।
जिनका इस्तेमाल करके वह स्वयं को और अपने परिवार को सक्षम बनाने की कोशिश करता है, इसके विपरीत "अशिक्षा" एक व्यक्ति विशेष को मानसिक रूप से किसी दूसरे का ग़ुलाम बनाती है, अशिक्षित व्यक्ति के अपराध करने के चांसेस काफ़ी बढ़ जाते हैं।
तो हर दौर में इसी असमानता की वजह से समय-समय पर कई समाज सुधारक आए हैं, और समाज में मौजूद हर तरह के भेदभाव और अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज़ को बुलंद करते हैं।
और समाज में अपना अधिकार लेने के लिए एक संघर्ष करते हैं, उस संघर्ष में अक्सर कुछ ही लोग उनका साथ देते हैं, लेकिन उनके सबसे करीबी लोग उनके दुश्मन बन जाते हैं, और उनको तरह-तरह की यातनाएं देते हैं।
और "समाज सुधार" के लिए जो कार्य किया जा रहे हैं, उन कार्यों को नहीं होने देना चाहते हैं, कुल मिलाकर यह किसी भी चिंगारी को हवा देना पसंद नहीं करते हैं।
बल्कि सत्ता के नशे में चूर होकर, हर समाज सुधार को अपने पैर के जूते से बुझाने की कोशिश करते हैं।
अगर हम ध्यान दें, तो पाएंगे, असमानता, भेदभाव और अन्याय करने का जो एक उद्देश्य है, वह यह है, की जो लोग आज समाज में एक स्थान प्राप्त कर चुके हैं, तो वह स्थान उनसे किसी दूसरे को ना दिया जाए।
बल्कि उस स्थान में किसी को साझेदार भी नहीं बनाया जाए, सदियों से यही संघर्ष जारी है, इसी स्थान को प्राप्त करने के लिए, कोई अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है, तो कोई दूसरे के अधिकारों को छीनने के लिए लड़ रहा है।
तो इस फिल्म में जिस दंपति के संघर्ष की कहानी को बताया गया है, वह ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले, जिन्होंने महाराष्ट्र में सामाजिक सुधार के लिए काम किया।
एक भारतीय समाज सुधारक, विचारक और दार्शनिक थे। सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं, जिन्होंने महिलाओं के शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए लड़ाई लड़ी, उन्होंने 1848 में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला, जो भारत में पहला था।
समाज में एक बड़ा वर्ग अभी भी अपने संघर्षों की लड़ाई लड़ रहा है, बल्कि अपनी पहचान के लिए लड़ाई लड़ रहा है, जहां किसी को उसकी जाति देखकर, तो किसी को उसका धर्म देखकर टारगेट किया जाता है।
और ऐसी अनगिनत ख़बरें अभी भी हमारे सामने आती हैं, जहां जाति के आधार पर लोगों के साथ भेदभाव किया जाता है, और यह सिलसिला हज़ारों सालों से चल रहा है।
जिसमें कुछ हद तक तो कमी आई है, लेकिन यह पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है, अभी भी अगर एक बच्चा किसी मटके से पानी पी लेता है, तो उसकी जान ले ली जाती है।
एक बारात किसी जगह से निकलती है, तो दूल्हे की सिर्फ इसलिए पिटाई की जाता है, कि वह व्यक्ति घोड़ी पर बैठकर, किसी घर के सामने से निकल गया, कुछ लोगों को आज भी कुछ घरों के सामने से निकलने पर सर पर चप्पल लेकर निकलना पड़ता है।
यह सब उनके साथ इसलिए होता है, क्योंकि वह एक जाति से संबंध रखते हैं, इंसान की जाति उसके द्वारा बनाई हुई नहीं है, लेकिन फिर भी उसको सिर्फ इसी जाति की वजह से सज़ा दी जाती है, जोकि अमानवता है।
जो लोग जीवन में कुछ बेहतर करना चाहते हैं, और अपने जीवन में एक उद्देश्य को प्राप्त करना चाहते हैं, और समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, तो उन्हें इस मूवी को ज़रूर देखना चाहिए।
कि जो लोग भी इस दुनिया में ख़ुद को और समाज को सुधारने के कोशिश करते हैं, उनको कितनी परेशानियां, मुसीबत, और यातनाओं का सामना करना पड़ा है।
लेकिन वह अपने उद्देश्य से हिले नहीं, बिल्कुल भी डगमगाए नहीं, बल्कि मज़बूती के साथ डटे रहे, इसके साथ ही हमें हमारे आसपास एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहिए।
जिसमें भेदभाव ना हो, किसी के प्रति हमारे मन में द्वेष ना हो, नफरत ना हो, और हम किसी के साथ भी अन्याय नहीं करें, क्योंकि जिस तरह का व्यवहार हम खुद के लिए चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार हमें दूसरों के साथ करना पड़ेगा, तभी यह समाज सभी के लिए रहने लायक हो पाएगा।
अंत में सिर्फ इतना ही कि "शिक्षा" ही हथियार है, जोकि समाज से अन्याय को, भेदभाव को, समाप्त करती है।