जैसा कि हम सभी जानते हैं, कि पिछले 15-20 सालों से सभी राजनीतिक पार्टियों के राजनेताओं द्वारा लगातार शाब्दिक हिंसा की जा रही है, और देश में एक तरह से नफरत का माहौल बनाया जा रहा है, ऐसा ही एक वाक्या अभी गुज़रा है, जिसमें भोपाल की शान नवाब साहब के बारे में एक पार्षद के द्वारा अशोभनीय और निम्न स्तरीय टिप्पणी की गई है।

हमारे यहां यह शिक्षा दी जाती है, और सभी धर्म की यही मूलभूत शिक्षा भी है, कि जो व्यक्ति इस दुनिया से चला जाता है, अगर उसके बारे में हमें बात करनी है, तो उसके अच्छे कामों को याद करना चाहिए, और अगर उसके अंदर एक इंसान होने के नाते कोई बुराइयां या कमियां थी भी, तो भी उनका ज़िक्र नहीं करना चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है, कि राजनेताओं पर किसी भी तरह की कोई अच्छी बात और नियम लागू नहीं होता है, वह इन सभी बातों से परे हैं।

समाज में जो बुद्धिजीवी लोग हैं, और अपने समाज में मौजूद ताने-बने को धूमिल होने से बचाना चाहते हैं, तो वो समय-समय पर यह जानकारी उपलब्ध करवाते हैं, कि देश में जैसा कि हम सभी को लगता है, कि एक धर्म विशेष को टारगेट किया जा रहा है, लेकिन एक विचारधारा को भी टारगेट किया जा रहा है, उस विचारधारा को सिर्फ इसलिए टारगेट किया जा रहा है, क्योंकि वह हमारे साथ नहीं है, इसका एक छोटा सा उदाहरण इस प्रकार समझा जा सकता है, इस अतिवादी विचारधारा के तहत सुबह-शाम महात्मा गांधी को टारगेट किया जाता है और उनके संबंध में भी अनगिनत अशोभनीय और निम्न स्तरीय बातें की जाती है।

जिस व्यक्ति को सारी दुनिया देश की आज़ादी का हीरो मानती है, और उनके व्यवहार से उनकी सोच से प्रभावित होती है, उनकी जीवनी का अध्ययन करती है, अगर इसी देश में रहने वाले लोग ऐसे व्यक्ति के कुर्बानियों को नहीं मानते हैं, तो वो नवाब साहब की कुर्बानियों को कैसे मान सकते हैं?

इस सारे एपीसोड को समझने के लिए हमें ये बात को अच्छी तरह से समझना होगा, कि इतिहास हमेशा दो तरह से कवर किया जाता है, जिसमें एक पहलू सच का होता है, और दूसरा पहलू झूठ, सच की एक खासियत यह है, कि वह खालिस होता है, मिलावट से पाक होता है, लेकिन झूठ मिलावट के बिना ज़िंदा ही नहीं रह सकता, और झूठ में मिलावट की कोई इंतहा ही नहीं है उसमें हम जितनी चाहे मिलावट कर सकते हैं।

खैर जब यह बात भोपाल में आम हुई, तो इसमें तरह-तरह की बातें की जाने लगी, कि अक्सर वही लोग दूसरों को बुरा बोलते हैं, जो खुद अच्छे नहीं होते हैं, और जिनके इतिहास के बारे में संदेह होता है, वही लोग इतिहास पर सबसे ज़्यादा बात करते हैं, ऐसा अक्सर कहा जाता है, कि मौजूदा दौर में एक बेईमान व्यक्ति ईमानदारी की सबसे ज़्यादा बात करता है।

दरअसल यह बात जगज़ाहिर है, कि जो लोग संस्कारी होते हैं, वो अपने पूर्वजों की अच्छाइयों का बखान करते हैं, और पूर्वजों द्वारा किए गए अच्छे कामों से प्रोत्साहन हासिल करते हैं, लेकिन जिनका इतिहास नहीं होता है, वो अपने पूर्वजों की बातें नहीं करते हैं, बल्कि महान लोगों के ऊपर कीचड़ उछालकर अपनी कमियों को छुपा लेते हैं।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, हमारा भोपाल मोहब्बत का शहर है, झीलों की नगरी है, यहां पर सुकून है, यहां पर हरियाली है, लेकिन दुर्भाग्य से कुछ लोगों द्वारा हमारे भोपाल का माहौल खराब करने की हर संभव कोशिश की जा रही है, और हम सभी शहर वालों को एक दूसरे के खिलाफ लगातार वरगलाया जा रहा है। 

हालांकि हम भारतवासी या किसी भी देश के रहवासी कभी भी नफरत का माहौल बनाने के लिए वोट नहीं करते हैं, बल्कि हम अपने मताधिकार का प्रयोग हमारे देश को बेहतर बनाने के लिए करते हैं, इसके लिए सबसे पहले जहां हम रह रहे हैं, वहां पर सुकून होना ज़रूरी है, क्योंकि वह घर जिसमें गृह क्लेश होता है तरक्की नहीं कर पाता और हमेशा परेशान रहता है।

इसलिए हम देशवासियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए, कि हमने राजनेताओं को वोट किस लिए दिया है? और राजनेताओं की रोल एंड रिस्पांसिबिलिटी क्या है? क्योंकि उनका काम इतिहास के पन्नों को पलटना हरगिज़ नहीं हैं, या धार्मिक स्थलों की खुदाई करना नहीं है, उनका सिर्फ एक ही काम है, कि वो कैसे आज को बेहतर बनाने के लिए प्रयासरत हैं, ताकि हमारा भविष्य उज्जवल हो सके, हमारी युवा पीढ़ी देश और समाज के लिए दायित्व नहीं, बल्कि संपत्ति बन सके, उनके लिए ऐसे संसाधन ऐसा माहौल उपलब्ध करवाना चाहिए।

इसलिए हमें राजनेताओं के साथ अपना व्यवहार पारदर्शी रखना चाहिए, कि जिन कामों को करने के लिए आपको नियुक्त किया गया है, आप सिर्फ वहीं काम करें, जैसे नगर निगम का सफाई कर्मी हमसे इतिहास की बात करें या और इसके अलावा बात करें तो हम उसे कहेंगे कि जो तुम्हारा काम है तुम सिर्फ उतना करो बाकी चीजों पर ध्यान मत दो, राजनेताओं को यह बात बहुत अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए, कि ऊपर वाले ने उनको एक ओहदा दिया है, जिसमें उनको सिर्फ ज़रूरतमंदों की ज़रूरत को पूरा करने पर ध्यान रखना चाहिए।

क्योंकि ऐसा नहीं है, कि 15/20 सालों से ही हमारा देश अस्तित्व में आया है, बल्कि हमारा देश हज़ारों सालों से अस्तित्व में है, और अनेकता में एकता हमारे देश की पहचान है, यहां पर विभिन्न भाषाओं, विभिन्न जातियों, विभिन्न धर्मो के लोग रहते हैं, जो कि आपस में मिलजुल कर भाईचारे के साथ रहते हैं, हम सभी की दीवारें एक दूसरे से लगी हुई है, हम सभी एक दूसरे के सुख-दुख में साथी होते हैं, एक दूसरे के साथ व्यापार करते हैं, एक दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं, और एक दूसरे के धर्मों की इज़्ज़त करते हैं। 

मात्र 3/4 साल पहले तक सारी दुनिया में फैली एक खतरनाक महामारी कोरोना में हम सभी देशवासियों ने इस महामारी का मिलकर और डटकर सामना किया है, और हमारे बीच में से ही अनगिनत कोरोना वीर निकले हैं, जिन्होंने धर्म, जाति, भाषा को देखकर मानव सेवा नहीं की है,  बल्कि मानव की तकलीफ को देखकर या मानव को तकलीफ में देखकर मानव सेवा करी है, इस समय यह सभी राजनेता नदारत थे।

इसके लिए मैं ऊपर वाले का शुक्रगुज़ार हूं, कि उसने न्यूज़ मोहल्ला फाउंडेशन को मानव सेवा का मौका दिया, और ऊपर वाले की यही कृपा अभी भी हमारे ऊपर बनी हुई है, कि हम मानव सेवा कर रहे हैं।

अक्सर ये कहावत गांव में बड़ी मशहूर होती है, कि जनता का ध्यान भटकाने के लिए भैंस की घंटी को एक व्यक्ति लेकर भागता है, और दूसरे डायरेक्शन में भैंस को लेकर एक व्यक्ति, तो हम लोगों का ज्वलनशील मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं, जिसमें सिर्फ और सिर्फ अपनी पार्टी का बचाव मकसद होता है, ताकि आम लोग अगर ज़रूरी मुद्दों को गैर ज़रूरी समझ कर उसमें ही उलझे रहे, और समय-समय पर उनको नए-नए मुद्दे मिलते रहे, इससे कई साल गुज़र जाते हैं, राजनीतिक पार्टिया आगे बढ़ती जाती हैं, लेकिन देश और देशवासी पीछे होते जाते हैं। 

इसके लिए मीडिया का चौथा स्तंभ पूरी तरह से ज़िम्मेदार है, क्योंकि ये समाज में मौजूद सच को नहीं दिखाता है, और इसलिए ये दिन और रात, सुबह और शाम सिर्फ नफरत फैलाता है, क्योंकि इन मीडिया हाउसों को सरकारों की तरफ से एडवर्टाइज़मेंट मिलते हैं, इस वजह से यह लोग अपनी विश्वसनीयता को खो चुके हैं, और तरह-तरह के नामों से समाज में पुकारे जाते हैं, ये न्यूज़ चैनल 24 घंटे आग में पानी डालने का नहीं, बल्कि घी डालने का काम पिछले 15/20 सालों से कर रहे हैं।

यहां यह बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए, कि जो हमारे हिंदी भाषा बेल्ट हैं वहीं पर सबसे ज्यादा नफरत फैलाने का खेल खेला जा रहा है और यही वह बेल्ट है जहां पर स्कूल बंद हो रहे हैं, लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल रही है, कारोबार और रोज़गार के अवसर नहीं मिल रहे हैं, इन बेल्टों में कुपोषण है, इन बेल्टों में अपराध है, इन बेल्टों में औरतों पर अपराध और रेप है, इन बेल्टों में नशा है, इन बैंकों में जुआ और सट्टा है, इन बेल्टों में चाइल्ड और वूमेन ट्रैफिकिंग है, जहां बच्चों और औरतों को चोरी किया जाता है, उनके साथ मानव तस्करी होती है।

तो कुल मिलाकर हिंदी भाषी बेल्टों में, इन पार्टियों की लड़ाई में नुकसान, हम आम लोगों को हो रहा है, सभी राजनीतिक पार्टिया खूब फलफूल रही है, और उनके पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है।