भोपाल।
वर्ष 2025-26 में भोपाल जिले की कुल 87 मदिरा दुकानों को केवल 04 बड़े समूहों में विभाजित किया गया था। इस व्यवस्था के चलते जिले में चंद बड़े शराब ठेकेदारों का दबदबा बना रहा। लेकिन शासन ने आगामी वर्ष 2026-27 के लिए शराब नीति में बड़ा बदलाव करते हुए इन 04 समूहों को विघटित कर भोपाल जिले की समस्त 87 कम्पोजिट मदिरा दुकानों को 20 नए समूहों में पुनर्गठित कर दिया है।

शासन के इस फैसले को शराब व्यवसाय में एकाधिकार खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। नई व्यवस्था से जहां छोटे और नए लायसेंसियों को व्यवसाय में प्रवेश का अवसर मिलने की उम्मीद जगी है, वहीं मौजूदा बड़े लायसेंसियों में घबराहट का माहौल देखा जा रहा है।

घाटे का प्रचार, मुनाफा हकीकत?

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, वर्तमान वर्ष 2025-26 में फरवरी 2026 के अंत तक भोपाल जिले के प्रत्येक समूह से मौजूदा लायसेंसियों को 50 करोड़ रुपये से अधिक का मुनाफा हो चुका है। इसके बावजूद बड़े लायसेंसी घाटे का हवाला देकर यह प्रचार कर रहे हैं कि शराब व्यवसाय नुकसान का सौदा है।

सूत्रों का दावा है कि घाटे का यह प्रचार सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, ताकि छोटे, नए और अन्य जिलों के इच्छुक ठेकेदार डर के कारण वर्ष 2026-27 के टेंडर में भाग न लें।

नीति बदलवाने की कोशिश?

बताया जा रहा है कि यदि नए 20 समूहों में पर्याप्त निविदाएं नहीं आती हैं, तो शासन पर दोबारा दबाव बनाया जाएगा कि वह नीति में बदलाव कर फिर से बड़े-बड़े 5-6 समूह बनाए। इससे बड़े समूहों की निविदा प्रक्रिया में छोटे और नए ठेकेदार स्वाभाविक रूप से बाहर हो जाएंगे और एक बार फिर शराब व्यवसाय पर मौजूदा बड़े ठेकेदारों का एकाधिकार कायम हो सकेगा।

शासन के सामने बड़ी चुनौती

अब देखना यह होगा कि शासन घाटे के दुष्प्रचार और दबाव की राजनीति के बावजूद अपनी नई नीति पर कितना मजबूती से खड़ा रहता है। यदि 20 समूहों की व्यवस्था सफल होती है, तो यह शराब व्यवसाय में प्रतिस्पर्धा, पारदर्शिता और समान अवसर की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है।