पत्रकारिता का सच और पत्रकारों की चुनौतियाँ
लेखक: फैजुद्दीन खान, प्रधान संपादक, न्यूज़ मोहल्ला
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। यही वह ताक़त है जो सत्ता से सवाल करती है, जनता की आवाज़ उठाती है और समाज में हो रही बुराइयों और अन्याय को उजागर करती है। लेकिन आज का दौर पत्रकारों के लिए सबसे कठिन होता जा रहा है। सच बोलना और सच दिखाना कई बार उनकी जान तक पर भारी पड़ जाता है।
पत्रकार क्यों चुनते हैं यह रास्ता?
एक पत्रकार पुलिस अफ़सर या मिलिट्री अफ़सर की तरह ही अपने फ़र्ज़ को निभाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि वह बंदूक नहीं उठाता, बल्कि कलम और कैमरे के जरिए लड़ाई लड़ता है। पत्रकार समाज का आईना होता है। वह अपनी रोज़ी-रोटी की परवाह किए बिना कई बार सच्चाई दिखाने में जुटा रहता है।
संविधान और प्रेस की आज़ादी
भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है - और यही स्वतंत्रता प्रेस की आज़ादी की कानूनी बुनियाद है। साथ ही, अनुच्छेद 19(2) में कुछ “संज्ञेय सीमाएँ” (जैसे सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, मानहानी आदि) दी गई हैं, परन्तु इन सीमाओं का दुरुपयोग भी सवाल पैदा करता है जब इन्हें पत्रकारों की आवाज़ दबाने के लिए हथियार बना दिया जाता है। प्रेस की आज़ादी केवल शब्दों में नहीं, हक़ीकत में होनी चाहिए - तभी लोकतंत्र सशक्त रहेगा।
सच्चाई दिखाने पर मिली सज़ा (भारत के उदाहरण)
भारत में कई पत्रकारों ने सच की कीमत अपनी जान देकर चुकाई या गंभीर उत्पीड़न सहा। कुछ प्रमुख नाम जिनकी याद हर पत्रकारिता प्रेमी के ह्रदय में रहती है:
गौरी लंकेश (2017, बेंगलुरु) - कट्टरपंथ और सार्वजनिक वाद-विवाद पर लिखने के कारण उनकी हत्या कर दी गई।
शुजात बुखारी (2018, श्रीनगर) - कश्मीर पर रिपोर्टिंग करने वाले शुजात बुखारी की हत्या।
राजदेव रंजन (2016, बिहार) - स्थानीय दबंगों और भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग के चलते मारे गए।
जगेंद्र सिंह (2015, उत्तर प्रदेश) - स्थानीय भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग के बाद उन पर हमला और हत्यासम्बंधी भयावह घटना हुई।
(ये नाम सैंकड़ों केसों का प्रतिनिधित्व करते हैं - हर नाम के पीछे एक परिवार, बच्चे और अधूरा जीवन जुड़ा है।)
झूठे मुक़दमे, आर्थिक दबाव और परिवार पर हमला
सिर्फ़ मार देना ही नहीं - कई बार पत्रकारों को झूठे आरोप, FIR, दुरुपयोगी कानूनी कार्रवाई, IT/सीबीआई जैसी संस्थाओं की छापेमारी या आर्थिक दबाव से घेरा जाता है। सरकारी विज्ञापन रोक दिए जाना, बैंकिंग/रैड/टैक्स जांच जैसी क्रियाएँ भी किसी समाचार संस्थान या पत्रकार पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं - और यह सब अक्सर मोहभंग कराने की तकनीकें बन जाती हैं। परिवारों को धमकाना, उनका सामाजिक बहिष्कार कराना, और उनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को अस्थिर करना भी एक आम दबाव का हिस्सा है।
एक जानें-माने उदाहरण में, अक्टूबर 2020 में एक पत्रकार को रिपोर्टिंग के इरादे से जा रहे समय गिरफ्तार कर लिया गया - इस तरह के मामले दर्शाते हैं कि कैसे रिपोर्टिंग करते समय पत्रकारों को कानूनी चुनौतियों और लम्बी जमानत/सजा की प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है।
दुनिया भर के वो पत्रकार जिनकी कलम खामोश कर दी गई
सच लिखने की सज़ा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं:
जमाल खशोगी (2018, सऊदी अरब) - इस्तांबुल में सऊदी कांसुलेट में हत्या।
अन्ना पोलितकोव्सकाया (2006, रूस) - चेचेन युद्ध और मानवाधिकार के मुद्दों पर रिपोर्टिंग के कारण हत्यारों का शिकार।
डैफ्ने कारुआना गालीज़िया (2017, माल्टा) - भ्रष्टाचार पर रिपोर्टिंग के बाद कार बम धमाके में मारी गईं।
मैरी कोल्विन (2012, सीरिया) - युद्ध कवरेज के दौरान मारी गईं।
आँकड़े क्या कहते हैं
अंतरराष्ट्रीय संगठनों की रिपोर्टें बताती हैं कि पत्रकारों पर हमले और हत्याएँ लगातार एक वैश्विक समस्या बनी हुई हैं। कई वर्षों में सैकड़ों पत्रकार ड्यूटी करते समय मारे गए; बहुत से मामलों में निष्पक्ष और तेज़ जांच नहीं हो पाई। यही रुझान लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती है।
समाधान और सुझाव - क्या किया जाना चाहिए
समस्याओं की पहचान के साथ-साथ ठोस कदम भी उठाने होंगे:
1. राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून - पत्रकारों की सुरक्षा और उन पर हमलों की सख़्त और विशेष श्रेणी में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने वाला कानून बनाया जाए।
2. तेज़, पारदर्शी और निष्पक्ष जाँच - पत्रकारों पर हमले/हत्या के मामलों की जांच त्वरित हो, विदेशों की तरह स्वतंत्र विशेष जांच टीम (SPT) गठित की जा सकती है।
3. प्रेस काउंसिल को कानूनी ताक़त - प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को सिर्फ़ ऐडवाइज़री बॉडी न रखकर शिकायत निवारण और सुरक्षा की वास्तविक शक्तियाँ दी जाएँ।
4. आर्थिक सुरक्षा व संरक्षण - सरकारी विज्ञापन नीति पारदर्शी हो; विज्ञापन को हठात ही बंद कर कोई आर्थिक दबाव न बनाया जाए। मारे गए या उत्पीड़ित पत्रकारों के परिवारों के लिए सरकारी अनुदान, पढ़ाई/आवास सहायता और सुरक्षा कवच सुनिश्चित किया जाए।
5. कानून का दुरुपयोग रोके जाए - झूठे FIRs, अनुचित छापेमारी और लंबी न्यायिक प्रक्रियाओं के दुरुपयोग पर सख़्त नियम और निगरानी रखें।
6. सामाजिक जागरूकता और समर्थन - जनता को समझाना होगा कि पत्रकारों पर हमला लोकतंत्र पर हमला है; नागरिकों का समर्थन और संस्थागत दबाव ही बदलाव ला सकता है।
7. अंतरराष्ट्रीय समर्थन और निगरानी - मानवाधिकार और प्रेस-फ्रीडम संस्थाओं के साथ समन्वय बढ़ाया जाए ताकि गंभीर मामलों में वैश्विक ध्यान और दबाव मदद कर सके।
निष्कर्ष - कदम उठाइए, वरना आईना टूट जाएगा
पत्रकार सिर्फ़ खबर लिखने वाले नहीं - वे समाज के प्रहरी हैं। भारतीय संवैधानिक व्यवस्था ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, पर उसे जमीन पर सुरक्षित बनाना हमारी साझा ज़िम्मेदारी है। वह कलम जब डगमगाएगी, लोकतंत्र भी डगमगा जाएगा।
अब वक्त है कि हर नागरिक, संस्था और सरकार मिलकर पत्रकारों को वह सुरक्षा, सम्मान और इन्साफ़ दें जिसके हम हकदार हैं - नहीं तो कल हम सब ही अँधेरे में रह जाएंगे।
लेखक - फैजुद्दीन खान
(प्रधान संपादक, न्यूज़ मोहल्ला)