भोपाल, 10 अगस्त न्यूज मोहल्ला

प्रसिद्ध उर्दू हास्य-व्यंग्यकार अब्दुल अहद ख़ां ‘तख़ल्लुस भोपाली’ को उनकी पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। बज़्मे शाहिद अख़्तर, भोपाल द्वारा आयोजित “यादे तख़ल्लुस भोपाली” कार्यक्रम में शहर और देश-विदेश से आए साहित्यकारों व समाजसेवियों ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को याद किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार इक़बाल मसूद ने कहा,

> “तख़ल्लुस भोपाली उर्दू अदब का कोहिनूर थे, जिसे हमने मिट्टी में मिला दिया। उन्होंने भोपाल की बोली को न केवल अपने लेखन में शामिल किया, बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई और एक भाषा के स्तर तक पहुंचाया।



उन्होंने जोर देकर कहा कि युवा पीढ़ी को तख़ल्लुस भोपाली से परिचित कराना आवश्यक है, ताकि वह भोपाल की संस्कृति, जीवनशैली और किरदारों को समझ सके।

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित कनाडा के साहित्यकार प्रो. डॉ. इक़बाल मसूद नदवी ने तख़ल्लुस भोपाली से जुड़ी कई रोचक यादें और लतीफ़े साझा किए। उन्होंने कहा कि उनके लेखन में वह मिठास और हाज़िरजवाबी थी जो अब दुर्लभ हो गई है।

तख़ल्लुस भोपाली की प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य रचनाओं में “पानदान वाली ख़ाला” (तीन भाग), “ग़फूर मियां”, “पोस्टमार्टम” और “शैतान जाग उठा” प्रमुख हैं, जिनमें उन्होंने भोपाली भाषा में शहर की तहज़ीब और चरित्रों को जीवंत किया। वह ‘भोपाल पंच’ नामक अख़बार भी निकालते थे। दुर्भाग्यवश, उनकी पुस्तकें अब आउट ऑफ़ प्रिंट हो चुकी हैं।

कार्यक्रम में उनकी बेटी इफ़्फ़त बानो ने घरेलू किस्सों के माध्यम से पिता की निजी जिंदगी की झलक पेश की। इस अवसर पर मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी के पूर्व सचिव डॉ. हिसामुद्दीन फारुक़ी, डॉ. क़मर अली शाह, शायर ख़ालिद ग़नी, एडवोकेट शाहनवाज़ ख़ान, शायर परवेज़ अख़्तर, पत्रकार रिज़वान शानू, सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद यूसुफ़ ख़ान और समीनुज़्ज़फर सहित कई गणमान्य उपस्थित रहे।

सभी वक्ताओं ने एक स्वर में तख़ल्लुस भोपाली की रचनाओं के पुनर्प्रकाशन की मांग की, विशेषकर देवनागरी लिपि में, ताकि नई पीढ़ी इस अनोखे कलमकार के योगदान से परिचित हो सके।

कार्यक्रम का संचालन बद्र वास्ती ने किया और आभार प्रदर्शन तख़ल्लुस भोपाली के दामाद मोहम्मद आज़म ख़ान ने किया।

फैजुद्दीन खान - एडिटर इन चीफ 9301363785/7999357775